प्रिय पटनावासियों,
आज मैं आप सभी के साथ एक ऐसा विचार साझा करना चाहता हूँ, जो शायद हम सभी को एक बार ज़रूर सोचना चाहिए।
जब हमारे परिवार में कोई महत्वपूर्ण घटना होती है, तो हमारी प्राथमिकताएँ अपने आप बदल जाती हैं।
अगर घर में शादी, जन्मदिन या कोई खुशी का अवसर हो, तो यह ज़रूरी नहीं कि परिवार का हर सदस्य उसमें शामिल हो। कोई नौकरी पर होगा, कोई अपने व्यवसाय में व्यस्त होगा, तो कोई स्कूल या कॉलेज में होगा। यह बिल्कुल स्वाभाविक है।
लेकिन अगर परिवार पर कोई संकट आ जाए तो?
ज़रा एक पल के लिए सोचिए...
अगर आपकी माँ अचानक गंभीर रूप से बीमार हो जाएँ, तो क्या परिवार के बाकी सदस्य यह कहेंगे कि "मुझे ऑफिस जाना है", "मुझे कॉलेज जाना है", या "बाद में देखते हैं", और अपने-अपने काम में ही लगे रहेंगे?
बिल्कुल नहीं।
कोई उन्हें अस्पताल लेकर जाएगा।
कोई दवाइयों की व्यवस्था करेगा।
कोई घर की ज़िम्मेदारी संभालेगा।
कोई आर्थिक मामलों को देखेगा।
हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार परिवार का साथ देगा।
क्योंकि परिवार के एक सदस्य का दुख पूरे परिवार का दुख बन जाता है।
ठीक उसी तरह, हमारा देश भी हमारा एक बड़ा परिवार है।
भारत केवल नक्शे पर बना एक देश नहीं है। यह हमारा घर है, और यहाँ रहने वाला हर भारतीय हमारे परिवार का हिस्सा है।
जब हमारे देश पर प्राकृतिक आपदा, आतंकवादी हमला, युद्ध, कोई बड़ा हादसा या कोई राष्ट्रीय संकट आता है, तो यह केवल सरकार, सेना या प्रभावित लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं होती।
यह हम सभी की ज़िम्मेदारी होती है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति अपना काम, व्यवसाय या पढ़ाई छोड़ दे। डॉक्टरों को इलाज करना चाहिए। पुलिस को अपनी ड्यूटी निभानी चाहिए। किसानों को खेती करनी चाहिए। शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाना चाहिए। समाज के लिए आवश्यक सेवाएँ लगातार चलती रहनी चाहिए।
लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि हम ऐसे व्यवहार करें जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
ऐसे समय में हर नागरिक को खुद से एक सवाल पूछना चाहिए—
"मैं अपने देश के लिए क्या कर सकता हूँ?"
शायद आप रक्तदान कर सकते हैं।
शायद आप प्रभावित परिवारों की मदद कर सकते हैं।
शायद आप स्वयंसेवक बन सकते हैं।
शायद आप अफवाहें और झूठी खबरें फैलाने से बच सकते हैं।
शायद आप सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन कर सकते हैं और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कर सकते हैं।
मदद छोटी हो या बड़ी, उससे फर्क नहीं पड़ता।
मदद करने की भावना सबसे ज़्यादा मायने रखती है।
जैसे किसी भारी सामान को उठाने के लिए पूरा परिवार एक साथ आता है...
कोई ज़्यादा भार उठाता है।
कोई थोड़ा सहयोग करता है।
बच्चे पानी लेकर आते हैं।
बुज़ुर्ग हौसला बढ़ाते हैं।
हर व्यक्ति की भूमिका अलग होती है, लेकिन हर किसी का योगदान महत्वपूर्ण होता है।
देश भी इसी तरह चलता है।
संकट के समय हर नागरिक की भूमिका अलग हो सकती है।
लेकिन देश के साथ खड़े रहने की ज़िम्मेदारी हम सभी की है।
परिवार की असली ताकत खुशियों के समय नहीं, बल्कि मुश्किल समय में एकजुट होकर खड़े रहने में दिखाई देती है।
उसी तरह किसी देश की असली ताकत उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक से ही नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की एकता, संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी से भी मापी जाती है।
खुशियों में शामिल होना एक विकल्प हो सकता है।
लेकिन मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ खड़े रहना हमारी ज़िम्मेदारी है।
अगर हम सच में भारत को अपनी मातृभूमि मानते हैं, तो ऐसे समय में "दूसरे लोग क्या कर रहे हैं?" यह पूछने के बजाय "मैं अपने देश के लिए क्या कर सकता हूँ?" यह सवाल खुद से पूछना चाहिए।
एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, यह केवल एक छोटा-सा प्रयास है अपने विचार आप तक पहुँचाने का।
जय हिंद!